आर्सेलर मित्तल निप्पोन स्टील की किरंदुल में एशिया की सबसे बड़ी स्लरी पाइपलाइन विस्तार पर हाई सिक्योरिटी में जनसुनवाई — लौह चूर्ण बाहर और लाल अपशिष्ट पावडर से बंजर जमीन,लाल पानी,लाल धूल से होने वाली बीमारी स्थानीय लोगों के हिस्से।

120 मिलियन टन क्षमता विस्तार की तैयारी, 383 हेक्टेयर जमीन दांव पर — जनप्रतिनिधि, ग्रामीण और संगठन रहे मौजूद पर्यावरण पर कंपनी की चुप्पी बरकरार। 

दंतेवाड़ा / किरंदुल।
लौह नगरी किरंदुल में स्थापित आर्सेलर मित्तल निप्पोन स्टील इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (AMNS) का एशिया का सबसे बड़ा स्लरी पाइपलाइन आधारित बेनिफिसियेशन प्लांट एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। इस प्लांट से प्रतिदिन लाखों टन लौह चूर्ण पाइपलाइन के माध्यम से किरंदुल से विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश) भेजा जाता है, जबकि इसके बदले स्थानीय लोगों को लाल धूल, लाल पानी और लाल अपशिष्ट का दंश झेलना पड़ रहा है।
मेसर्स आर्सेलर मित्तल निप्पॉन स्टील इंडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा ग्राम किरंदुल में स्थित बेनिफिसियेशन प्लांट के क्षमता विस्तार के लिए पर्यावरणीय स्वीकृति मांगी गई है। प्रस्ताव के अनुसार प्लांट की क्षमता को वर्तमान 8.0 मिलियन टन प्रति वर्ष से बढ़ाकर 120 मिलियन टन प्रति वर्ष किया जाना है। इस विस्तार के लिए कुल 383 हेक्टेयर (98.43 एकड़) क्षेत्र प्रस्तावित है।
इसी क्रम में छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल के समक्ष आवेदन उपरांत 30 दिसंबर (मंगलवार) सुबह 11 बजे बी.आई.ओ.पी. सीनियर सेकेंडरी स्कूल, किरंदुल बस स्टैंड के पास, जिला दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा में लोक सुनवाई आयोजित की गई।
लोक सुनवाई स्थल को चारों ओर से टेंट लगाकर पूरी तरह घेराबंदी कर दी गई थी। वहीं एनएमडीसी किरंदुल परियोजना के ग्राउंड को भारी पुलिस बल की तैनाती के साथ छावनी में तब्दील कर दिया गया। सुरक्षा के कड़े इंतजाम यह संकेत दे रहे थे कि प्रशासन किसी बड़े विरोध या असहमति की आशंका पहले से जता रहा था।
इस लोक सुनवाई में प्रभावित ग्राम पंचायतों के जनप्रतिनिधि, स्थानीय ग्रामीण, सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि तथा प्रशासनिक अधिकारी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। सभी पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर दिया गया, लेकिन कई ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों का आरोप रहा कि सबसे गंभीर मुद्दों को नजरअंदाज किया गया।

स्थानीय लोगों का कहना है कि पाइपलाइन से बैलाडीला का कीमती लौह चूर्ण तो बाहर भेज दिया जाता है, लेकिन प्लांट से निकलने वाला लाल अपशिष्ट पदार्थ उपजाऊ जमीनों में दफन किया जा रहा है। वहीं उड़ती लाल धूल लोगों के फेफड़ों में जाकर सांस संबंधी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ा रही है। ग्रामीणों ने सवाल उठाया कि जब लौह चूर्ण पाइपलाइन से ले जाया जा सकता है, तो यह लाल पावडर और अपशिष्ट क्यों नहीं?
जनसुनवाई में रोजगार, ट्रक मालिकों को काम और विकास जैसे विषयों पर चर्चा जरूर हुई, लेकिन लाल पानी, लाल धूल, अपशिष्ट प्रबंधन और पर्यावरणीय नियमों के पालन जैसे अहम सवालों पर कोई ठोस और संतोषजनक जवाब सामने नहीं आया।

कुल मिलाकर, यह जनसुनवाई एक बार फिर यह सवाल छोड़ गई कि —

क्या बस्तर की धरती सिर्फ खनिज देने के लिए है और बदले में प्रदूषण, बीमारियां व बंजर जमीन पाने के लिए?
किरंदुल की यह लोक सुनवाई विकास और पर्यावरण के बीच टकराव की एक और तस्वीर बनकर उभरी है, जहां लौह चूर्ण की चमक में लाल ज़हर छिपा होने का आरोप अब और तेज़ होता जा रहा

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